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और भी गम है ज़माने में...के सिवा...डॉ अमर (साभार रचना)

Posted on
  • Thursday, September 8, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal
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  • मैं शुक्रगुज़ार हूं रचना जी का, जिन्होंने डॉ अमर कुमार की ये अनमोल टिप्पणियां इस ब्लॉग के लिए भेजी...

    डा. अमर कुमार ने कहा

    A sensible point, raised by Rachna Singh.
    It should have been mentioned at least, lest it might be taken as cleverely ignored issue.
    Intentions are never questioned, but an action asks clarification to justify itself.
    A compromising comfort is deteriorating the Hindi Scenerio, leave apart the serenity and satisfaction of blogging.
    Not deviating from the main point, I submit that Rachna's objection is genuine this time. I am with it.

    http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/10/transmission-loss.html

    October 27, 2009 11:12 AM

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    डा. अमर कुमार ने कहा…
    .
    आप भी..क्या अनूप भाई,
    अच्छा भला उछलता कूदता यहाँ आया था कि
    आपने दरवाज़े से ही अरविन्द के यहाँ का रास्ता दिखा दिया ।
    सच तो यह है, कि नारी नितम्ब सुनते ही, फ़ुरसतिया को फ़ुरसत के लिये छोड़ छाड़
    मैं भी दौड़ पड़ा कि कहीं कोई भला आदमी मेरे पहुँचने से पहले ही उन नितम्बों को
    ढक-ढुक न दे, लेकिन वहाँ तो ऎसी चूतड़-छिलाई हो रही है,
    कि बीच बचाव में एक फ़ुरसतिया टिप्पणी छोड़ कर आनी ही पड़ी ..
    अब आपका हिस्सा कट !
    आज ही ज्ञानजी का सुप्रभातिया ज्ञान प्राप्त हुआ है..
    कि उर्ज़ा बचाओ, उर्ज़ा बचाओ..चुक गये..तो तुमसे कौन डील करेगा ?
    अस्तु, अब रोकियेगा नहीं..चलने ही दीजिये ।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/2008/07/blog-post_31.html?showComment=1217512200000#c1774389278032613172

    July 31, 2008 7:20 PM

    डा. अमर कुमार said...
    .

    श्रीमान इम्पैक्ट जी,
    मैं तो आपको ज़वाब देना भी उचित नहीं समझता,
    केवल अन्य पाठकों की जानकारी के लिये
    अपना टाइम खोटी कर रहा हूँ !

    क्यों बतंगड़ खड़ा कर रहे हो भाई ?
    ज़रा पढ़ा लिखा भी करो,
    कि सिर्फ़ ब्लागर पर ही अपना x...x बघारोगे ?
    नवीनतम अनुसंधानों के परिणाम देखो..डार्विन ने
    विश्व को आगे चलने के एक दिशा दी और सफल रहे ।
    किंतु आज वह सिद्ध नहीं हो पा रहे हैं ।

    चलो छोड़ो, मँहगी किताबें कहाँ खरीदोगे,
    अपने यहाँ रद्दी में पड़ी हुई कोई भी
    10 साल पुरानी विज्ञान की किताब उठा लो,
    फिर इस दौर की किताबों में फ़र्क़ करो ।
    मैं ग़लत हो सकता हूँ..मैं कोई विश्वकोष भी नहीं,
    मैं भी तो जानना चाह रहा हूँ कि
    यह नितम्ब विज्ञानी ' डिज़्माण्ड ' साहब कहाँ पाये जाते हैं ?
    ज्ञान में इज़ाफ़ा करते रहने की कोई आयुसीमा तो है नहीं ?

    लेकिन..छोड़ो, मैं भी कहाँ उलझ गया ? अपना चेहरा न सही
    किंतु प्रोफ़ाइल पर अपना नाम पता देने का साहस तो रखो !
    क्या पता, कल को यह नाचीज़ ..
    तुम्हारा शिष्यत्व ग्रहण करने पहुँच ही जाये ।

    इति..बोले तो It is enough, now !
    http://indianscifiarvind.blogspot.com/2008/07/blog-post_26.html1 August 2008 00:10


    डा. अमर कुमार said...
    .

    सर्वप्रथम यह स्पष्ट करें,
    क्या नर होकर भी नारियों के हित में कुछ कहा जा सकता है ? हाँ...तो,

    कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
    मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि श्री मिश्राजी इस विषय पर घंटों ही नहीं
    बल्कि कई दिनों तक लगातार शास्त्रार्थ करने के लिये आमंत्रित हैं ।

    कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
    अपने गुरु डिज़्माण्ड के हवाले से वह फरमा रहे हैं
    कि, ' नारी के नितम्ब यौनाकर्षण की अपनी भूमिका में इतने बड़े और भारी होते गये कि रति क्रीडा ...'
    वैज्ञानिक निष्कर्ष किंन्हीं आँकड़ों के आधार पर निकलते हैं, न कि व्यक्तिगत अवधारणाओं पर !
    हॆई मिसिर महाराज..तनि रऊआ हमनि के समझायीं
    कि ' यौनाकर्षण की अपनी भूमिका ' के गुरुजी का व्याखिया देले हऊँवें ?

    माई डियर मिसिर डाक्टर अपना परवर्जन आप
    कंटेन्ट के नाम पर क्यों पड़ोसते हो, वह भी रतिया पौने आठे बजे ?

    कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
    अपने गुरुदेव डिज़्माण्ड जी के फ़क़त तीन पेपर्स का लिंक उल्लेख आदि दे कर
    हम मूढ़ पाठकों का भला करते तो जयकारा लगवा देता ।
    डिज़्माण्ड जी किस मुलुक मौज़ा मोहल्ले में बरामद होते हैं,
    यह भी खुलासा कर देते तो ऋणी होता ।

    कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
    क्योंकि मुझे इस टिप्पणी के बाद अपनी हाज़त का खुलासा करने जाना है,
    नहीं तो मैं यहीं मल विसर्जन की प्रक्रिया सचित्र प्रेषित कर अपने को वैज्ञानिक कहलाने का मौका न छोड़ता ।

    एक भोंड़ा सा अवैज्ञानिक प्रश्न छोड़ रहा हूँ,
    आख़िर लौंडों कि लुनाई और नितम्ब हथियाने की प्रतिस्पर्धा में ..
    छुरे क्यों चल जाया करते हैं ?
    जवाब सोच कर रखें, मैं शीध्र ही शौच कर आता हूँ !

    अरे अरविन्द भाई, अच्छा लिखते हो..
    तो अच्छा अच्छा ही लिखो न !
    और भी टापिक हैं, ज़माने में...चूतड़ों के सिवा ..हा हा हा ही ही


    31 July 2008 06:32

    http://indianscifiarvind.blogspot.com/2008/07/blog-post_26.html?showComment=1217511120000#c3385843689344701710

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