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मूर्तियां शिकायत नहीं करतीं...डॉ अमर (साभार डॉ अनुराग आर्य)



सेक्स वर्कर...वेश्यावृत्ति...दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक...लेकिन सबसे बदनाम...लेकिन इनसान तो वोभी है...दिल तो उनका भी धड़कता है...एक्सीडेंटली बच्चे उनके भी होते हैं...23 जनवरी 2010 को डॉ अनुराग आर्य ने पोस्ट लिखी...सरवाइवल ऑफ़ फिटेस्ट उर्फ़ नैतिकता के मेनिफेस्टो...पोस्ट पढ़िए और फिर उस पर आई डॉक्टर अमर कुमार की ये टिप्पणी पढ़िए...

http://anuragarya.blogspot.com/2010/01/blog-post_23.html

Dr Amar Kumar said...
म सभी अपने ही रचे हुये प्रवँचनाओं में लिसड़े पड़े हैं, उठने का प्रयास करो और फिसल कर वहीं गिर पड़ो ।
सब कहते हैं, दुनिया ऎसे ही चलती है.. आप भी चलते रहिये । वह, जिसको समाज की सँज्ञा दी जाती है, केवल इतना चाह्ता है कि कुटिल चालों और शोषण के मुखौटों के लिये उसके गढ़े हुये सम्मोहक मानकों का जयकारा लगता रहे, घृणित के लिये आदरणीय सँबोधन इज़ाद करके वह उसकी मान्यता सदियों से कबूलवाता आया है, मसलन टट्टी अस्पृश्य है, जबकि समानार्थी विष्ठा सँभ्राँत है । ’ सेक्स-वर्कर ’ तो एक अदना सा ज़ुमला भर है... डाक्टर तुमने इस दोगलेपन को इतनी बारीकी से बुना है कि विसँगतियों के अन्य प्रतीकों के मध्य यह मिलावट गौण हो गयी है ।
इस पोस्ट के कई छोटे छोटे बिन्दु एकसाथ मिल कर हमारे माथे पर कालिख एक उपस्थिति दर्ज़ करा सकते थे, पर ये प्रतीक-बिन्दु स्वयँ ही एक दूसरे पर भारी पड़ते नज़र आ रहे हैं ।
मूर्तियाँ पत्थर की होती हैं, शिकायत नहीं करतीं, लिहाज़ा कहीं भी बैठ जाती हैं... शिकायत करने वालों को आज तक भला कहीं ठौर मिल पाया है ?
भले हम सभ्य लोग इसे न मानें, पर.. " फिलहाल बाकी तमाम सेक्स वोर्कर इसे पाल रही है ", कथन में दयनीयता और जीजिविषा के टकराव में दयनीयता से टक्कर लेने की एकता है, यहाँ भरे पेट वालों का सिर-फुट्टौवल नहीं दीखता !
.. तो और धंधा करेंगी '' यह मनवा रहा है कि इस धँधे के ग्राहक हैं, और वह हमारे आपके बीच में ही बाइज़्ज़त घुल मिल कर अपनी पैठ बनाये हैं । ताज़्ज़ुब नहीं कि बाइज़्ज़त बरी बने रहने की चाह धँधे वालियों को मुज़रिम ठहरा रही है ।
NGO की पहल, मायने जागरूकता के चिराग जल उठने की आशँका... और चिराग की रोशनी या तो सच को उजागर करती है, या बदनीयत मँशाओं के ढेर में आग लगा देती है... फिर घाटा किसका ? NGO के या ऎसी कोई अन्य पहल का विरोध होना क्या दर्शाता है ?
समाज और इसके ठेकेदारों के कुटिलता और कपट के ज़खीरे का यह पोस्ट बहुत छोटा टुकड़ा है... मुझे लगता है भावावेश में टिप्पणी लँबी होती जा रही है, जबकि डाक्टर अरविन्द ने पहली ही टिप्पणी में " .... आत्मदयात्मक स्टाईल है या फिर टिप्पणी औदार्य की अभिलाषा से आप्लावित ? " का शो कॉज़ नोटिस लगा चुके हैं । आई ऍम सॉरी फ़ॅर आइदर ऑफ़ एनीवन, डाक्टर !
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घुटन को हरने वाला राजकुमार...डॉ अमर (साभार शिखा वार्ष्णेय)



शिखा वार्ष्णेय ने पिछले साल जेनेरेशन गैप पर बड़ी सारगर्भित पोस्ट लिखी थी- क्या करें  क्या न करें, ये कैसी मुश्किल हाय...इसमें बताया था कि मां-बाप कैसे अपनी पहाड़ जैसी उम्मीदों के तले अपने बच्चों के नैसर्गिक विकास को दबाए रखते हैं...खास तौर पर पिता बेटे से चाहता है कि जो वो जीवन में नहीं बन पाया, वो बेटा करके दिखाए...सुपरमैन जैसा हरफ़नमौला हो...उसी पोस्ट पर डॉ अमर कुमार ने ये टिप्पणी दी थी-

डा० अमर कुमार said...

मैं समझता हूँ कि यह एक यादगार पोस्ट के रूप में मन में बसी रहेगी ।
लड़का न हो गया.. पिता के अतृप्त आकाँक्षाओं के घुटन को हरने वाला राजकुमार !
पर.. माँ ? वह भी तो गाहे बगाहे गिनवाती रहती है, मेरा बेटा मेरे लिये यह करेगा, वह करेगा.. पहाड़ खोद देगा !
लड़का यदि घर में सबसे बड़ा हुआ, तो छूटते ही उसे छोटे भाई-बहनों का सँरक्षक मनोनीत कर दिया जाता है, वह अलग !
आपने मध्यमवर्गीय मानसिकता के केवल पक्ष को ही रखा है !



मैं शुक्रगुज़ार हूं शिखा का कि उन्होंने इस टिप्पणी समेत डॉक्टर साहब की कुछ टिप्पणियां इस ब्लॉग के लिए भेजी हैं....
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ब्लॉगिंग सिर्फ टाइमपास नहीं...डॉ अमर (...खुशदीप)



सितंबर 2009 में मुझे फरीदाबाद में पहली बार किसी ब्लॉगर मीट में हिस्सा लेने का मौका मिला था...इसका आयोजन अविनाश वाचस्पति भाई ने कराया था...उस मीट से लौटकर मैंने रिपोर्टिंग की थी...उसी पोस्ट पर डॉ अमर कुमार की ये टिप्पणी आई थी...

डा० अमर कुमार said...

सत्य वचन..
ब्लॉग के माध्यम को बड़ा सीरियसली लिया जाना चाहिए...सिर्फ टाइम पास या मनोरजंन के नज़रिए से ही नहीं लिया जाना चाहिए...
पर अपने हिन्दी ब्लागर तो अभी इसी पर एकमत नहीं हो पा रहे हैं, कि यह चीज एक माध्यम तो है, पर आख़िर है क्या.. टाइमपास, मनोविनोद या जस्ट मीन्स आफ़ परगेशन ?
ब्लाग जनमत को अपने सँग बहा ले जाने में, आम सोच को नयी दिशा देने में और प्रिंट एवँ इलेक्ट्रानिक मीदिया की निगहबानी करने में इस कदर सक्षम है, कि तानाशाही और कम्युनिस्ट सरकारें ब्लागर के नाम पर खौफ़ खाती हैं देखें वह सुबह यहाँ कब आती है ?
पर मेरे विद्वान मित्र, ब्लागिंग जगत में कुछ आइकन्स कहाँ से प्रविष्ट हो गये ? इनके आइकनत्व का मानक लैक्टोमीटर कहाँ से आया, यह आश्चर्य बना रहेगा
फिलवक्त तो अपने ब्लागजगत में स्थिति यह है कि,
उष्ट्राणाम् विवाहेषु गीतम् गायंति गर्दभाः |
परस्परम् प्रशंसति, अहो रूपम्, अहो ध्वनिः।|

September 14, 2009 1:04 AM

........................................................

नोट- अब मेरे पास डॉ अनुराग आर्य की पोस्टों पर आई डॉ अमर कुमार की टिप्पणियों के अलावा मेरे ब्लॉग पर आई टिप्पणियां ही इस ब्लॉग पर डालने को शेष है...आप सबसे अनुरोध है कि डॉ अमर कुमार के जो अनमोल वचन आपके पास हैं, उन्हें संचयित करने में अपना सहयोग दीजिए...मेरा ईमेल एड्रेस है...   sehgalkd@gmail.com
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अतुलनीय स्मृति सँचयन...डॉ अमर (साभार डॉ अनुराग आर्य)

डॉ अमर कुमार की टिप्पणियां ब्लॉग के लिए एकत्र करने की कोशिश में मुझे डॉ अनुराग आर्य को पढ़ने का मौका मिल रहा है...और मैं खुद को कोस रहा हूं कि डॉ अनुराग के नैसर्गिक लेखन में डूबने से पहले क्यों दूर रहा...डॉ अनुराग की पोस्ट पर आई डॉ अमर कुमार की ये टिप्पणी अपने आप में सब कुछ कह रही है...



http://anuragarya.blogspot.com/2010/02/blog-post_19.html

डा० अमर कुमार ने कहा…

अतुलनीय स्मृति सँचयन,
सार सँक्षेप शैली ऎसी कि पाठक विवश हो इन टुकड़ों की गहराई में उतरने को बाध्य हो जायें ।
ब्रेक लगाओ..ब्रेक जैसा सँयम तुमने कई जगह दिखाया है.. पर प्लास्टर वाली बात से शुरुआत, पाठकों को बरबस ही हमदर्द नज़रिये से पोस्ट पढ़ने और महसूस करने को मज़बूर करती रहती है । यह एक सफल शिल्प है... बस यही कि अतुलनीय स्मृति सँचयन !


पिछले कुछ दिनों से मुझे पोस्ट की सूचना क्यों नहीं मिल पाती ? मनोज जी की चर्चा से यहाँ पहुँचना.. मेरे लिये शर्मनाक है, न.. कि नहीं ?

नोट- अब मेरे पास डॉ अनुराग आर्य की पोस्टों पर आई डॉ अमर कुमार की टिप्पणियों के अलावा मेरे ब्लॉग पर आई टिप्पणियां ही इस ब्लॉग पर डालने को शेष है...आप सबसे अनुरोध है कि डॉ अमर कुमार के जो अनमोल वचन आपके पास हैं, उन्हें संचयित करने में अपना सहयोग दीजिए...मेरा ईमेल एड्रेस है...   sehgalkd@gmail.com
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ब्लागर दुनिया खूबसूरत, पर है मँज़िल लापता यारों...डॉ अमर कुमार

16 अगस्त 2009 को देशनामा पर मैंने पहली पोस्ट लिखी थी...खुशकिस्मत रहा कि पंद्रह दिन की ब्लॉगिंग के बाद ही मुझे डॉ अमर कुमार की पहली टिप्पणी मिल गई...तारीख थी 2 सितंबर 2009...इसके पांच दिन बाद ही  7 सितंबर को फिर डॉक्टर साहब की दूसरी टिप्पणी मिली...देखिए इन दोनों टिप्पणियों को मूल लिंक के साथ...



डा० अमर कुमार said...

ब्लागर दुनिया खूबसूरत तो है, पर है मँज़िल लापता यारों
फ़िक्रमँद क्यों ग़र किसी ने दोस्ती कर ली या दुश्मनी कर ली
September 2, 2009 2:37 AM


डा० अमर कुमार said...

लेकिन बाहर के राम लोगों पर भारी पड़ रहे हैं,
अँतर का रावण हुँकार भर रहा है
भारतदेश रामलीला का मैदान बना हुआ है
राम भली करें अँतर्मन के राम की !

September 7, 2009 2:03 AM
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चिरकुटई का कोटा...डॉ अमर (साभार डॉ अनुराग आर्य)

डॉ अनुराग ने पिछले साल पंद्रह अगस्त को पोस्ट लिखी थी- चिरकुटई की डेमोक्रेसी...उस पोस्ट पर आई डॉ अमर कुमार की टिप्पणी और लिंक भेजने के लिए डॉ अनुराग का बहुत बहुत शुक्रिया...इन टिप्पणियों की तलाश का प्लसपाइंट ये भी है कि जो कुछ बेहतरीन लिखा पढ़ने से छूट गया था, वो भी अब पढ़ने को मिल रहा है...




http://anuragarya.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

 
चिरकुट चिंतन से उपजी एक बेहतरीन कमेन्ट्री..
दरअसल इस मुल्क को भगवान ने ख़ास तौर पर चिरकुटई का कोटा ऍलाट किया है,
और.. सच तो यह है कि इन चिरकुटों ने इसके लिये अपने हिसाब से ऑर्डर पर भगवान तैयार कराया है ।
~~~अ कस्टॅमाइज़्ड गॉड फ़ुलफिलिंग दॅयर सेक्सी डिज़ॉयर्स, ===वॉऔ, व्हाट अ सेक्सी गड़ेंशा इन शॉकिंग रेड फ़ॅर कार-डैशबोर्ड.. गड़ेंशा नेंईं बेबी, इट स्पेल्ड गनेशा ! व्हाटेवर इट इज़... आय एम डाइंग टू हैव दिस पीस ऑफ़ गनेशा डियर हॅनी ! यह पढ़ कर हँसों मत चिरकुट, ऍप्लाज़ इट विद अ सेक्सी स्माइल !
अगर आप चीजों के सेक्सी होने में विश्वास नहीं करते, और ज़मीन से जुड़ा यथार्थ ढूँढ़ते फिरते हैं तो आप निरे दरज़े के चुगद और हारे हुये सटोरिये के पिद्दी लगते हैं । हद है यार, मुल्क व क़ौम के रोटी की चिन्ता में लोग दुबले होते हुये बिल्डिंगें खड़ी कर रहे हैं, और दो अदद ए.सी. रखने के अपराधबोध को ढोते हुये आप अपने लिये रोटी तलाश रहे हैं ?
रखिये अपने बगल में साढ़े छः सौ रुपिये के राजमोहन गाँधी को...
हद है, डॉक्टर अनुराग, जाने आप किस सदी के हैं, जो लोगों के सेक्सी सोच पर अपना भेज़ा ख़राब करते हुये तबाह हुये जा रहे हैं ? मौज़ूदा समय के ट्रेन्डी शब्दावली में कहूँ, तो... ( not to be moderated.. it kills the soul of the expression ! ) क्या पोस्ट लिखी है, पार्टनर । आपने तो फाड़ कर रख दी..


वैसे मेरा एक चिरकुट आग्रह भी है, ई-मेल सब्सक्रिप्शन विकल्प लगा लें, मुझे यह पोस्ट आज पढ़ने को मिली है !..

५ सितम्बर २०१० १२:३७ अपराह्न
डा० अमर कुमार ने कहा…

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और भी गम है ज़माने में...के सिवा...डॉ अमर (साभार रचना)


मैं शुक्रगुज़ार हूं रचना जी का, जिन्होंने डॉ अमर कुमार की ये अनमोल टिप्पणियां इस ब्लॉग के लिए भेजी...

डा. अमर कुमार ने कहा

A sensible point, raised by Rachna Singh.
It should have been mentioned at least, lest it might be taken as cleverely ignored issue.
Intentions are never questioned, but an action asks clarification to justify itself.
A compromising comfort is deteriorating the Hindi Scenerio, leave apart the serenity and satisfaction of blogging.
Not deviating from the main point, I submit that Rachna's objection is genuine this time. I am with it.

http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/10/transmission-loss.html

October 27, 2009 11:12 AM

-
डा. अमर कुमार ने कहा…
.
आप भी..क्या अनूप भाई,
अच्छा भला उछलता कूदता यहाँ आया था कि
आपने दरवाज़े से ही अरविन्द के यहाँ का रास्ता दिखा दिया ।
सच तो यह है, कि नारी नितम्ब सुनते ही, फ़ुरसतिया को फ़ुरसत के लिये छोड़ छाड़
मैं भी दौड़ पड़ा कि कहीं कोई भला आदमी मेरे पहुँचने से पहले ही उन नितम्बों को
ढक-ढुक न दे, लेकिन वहाँ तो ऎसी चूतड़-छिलाई हो रही है,
कि बीच बचाव में एक फ़ुरसतिया टिप्पणी छोड़ कर आनी ही पड़ी ..
अब आपका हिस्सा कट !
आज ही ज्ञानजी का सुप्रभातिया ज्ञान प्राप्त हुआ है..
कि उर्ज़ा बचाओ, उर्ज़ा बचाओ..चुक गये..तो तुमसे कौन डील करेगा ?
अस्तु, अब रोकियेगा नहीं..चलने ही दीजिये ।
http://chitthacharcha.blogspot.com/2008/07/blog-post_31.html?showComment=1217512200000#c1774389278032613172

July 31, 2008 7:20 PM

डा. अमर कुमार said...
.

श्रीमान इम्पैक्ट जी,
मैं तो आपको ज़वाब देना भी उचित नहीं समझता,
केवल अन्य पाठकों की जानकारी के लिये
अपना टाइम खोटी कर रहा हूँ !

क्यों बतंगड़ खड़ा कर रहे हो भाई ?
ज़रा पढ़ा लिखा भी करो,
कि सिर्फ़ ब्लागर पर ही अपना x...x बघारोगे ?
नवीनतम अनुसंधानों के परिणाम देखो..डार्विन ने
विश्व को आगे चलने के एक दिशा दी और सफल रहे ।
किंतु आज वह सिद्ध नहीं हो पा रहे हैं ।

चलो छोड़ो, मँहगी किताबें कहाँ खरीदोगे,
अपने यहाँ रद्दी में पड़ी हुई कोई भी
10 साल पुरानी विज्ञान की किताब उठा लो,
फिर इस दौर की किताबों में फ़र्क़ करो ।
मैं ग़लत हो सकता हूँ..मैं कोई विश्वकोष भी नहीं,
मैं भी तो जानना चाह रहा हूँ कि
यह नितम्ब विज्ञानी ' डिज़्माण्ड ' साहब कहाँ पाये जाते हैं ?
ज्ञान में इज़ाफ़ा करते रहने की कोई आयुसीमा तो है नहीं ?

लेकिन..छोड़ो, मैं भी कहाँ उलझ गया ? अपना चेहरा न सही
किंतु प्रोफ़ाइल पर अपना नाम पता देने का साहस तो रखो !
क्या पता, कल को यह नाचीज़ ..
तुम्हारा शिष्यत्व ग्रहण करने पहुँच ही जाये ।

इति..बोले तो It is enough, now !
http://indianscifiarvind.blogspot.com/2008/07/blog-post_26.html1 August 2008 00:10


डा. अमर कुमार said...
.

सर्वप्रथम यह स्पष्ट करें,
क्या नर होकर भी नारियों के हित में कुछ कहा जा सकता है ? हाँ...तो,

कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि श्री मिश्राजी इस विषय पर घंटों ही नहीं
बल्कि कई दिनों तक लगातार शास्त्रार्थ करने के लिये आमंत्रित हैं ।

कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
अपने गुरु डिज़्माण्ड के हवाले से वह फरमा रहे हैं
कि, ' नारी के नितम्ब यौनाकर्षण की अपनी भूमिका में इतने बड़े और भारी होते गये कि रति क्रीडा ...'
वैज्ञानिक निष्कर्ष किंन्हीं आँकड़ों के आधार पर निकलते हैं, न कि व्यक्तिगत अवधारणाओं पर !
हॆई मिसिर महाराज..तनि रऊआ हमनि के समझायीं
कि ' यौनाकर्षण की अपनी भूमिका ' के गुरुजी का व्याखिया देले हऊँवें ?

माई डियर मिसिर डाक्टर अपना परवर्जन आप
कंटेन्ट के नाम पर क्यों पड़ोसते हो, वह भी रतिया पौने आठे बजे ?

कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
अपने गुरुदेव डिज़्माण्ड जी के फ़क़त तीन पेपर्स का लिंक उल्लेख आदि दे कर
हम मूढ़ पाठकों का भला करते तो जयकारा लगवा देता ।
डिज़्माण्ड जी किस मुलुक मौज़ा मोहल्ले में बरामद होते हैं,
यह भी खुलासा कर देते तो ऋणी होता ।

कुल मिला कर यह आलेख वैज्ञानिक तो कतई नहीं है,
क्योंकि मुझे इस टिप्पणी के बाद अपनी हाज़त का खुलासा करने जाना है,
नहीं तो मैं यहीं मल विसर्जन की प्रक्रिया सचित्र प्रेषित कर अपने को वैज्ञानिक कहलाने का मौका न छोड़ता ।

एक भोंड़ा सा अवैज्ञानिक प्रश्न छोड़ रहा हूँ,
आख़िर लौंडों कि लुनाई और नितम्ब हथियाने की प्रतिस्पर्धा में ..
छुरे क्यों चल जाया करते हैं ?
जवाब सोच कर रखें, मैं शीध्र ही शौच कर आता हूँ !

अरे अरविन्द भाई, अच्छा लिखते हो..
तो अच्छा अच्छा ही लिखो न !
और भी टापिक हैं, ज़माने में...चूतड़ों के सिवा ..हा हा हा ही ही


31 July 2008 06:32

http://indianscifiarvind.blogspot.com/2008/07/blog-post_26.html?showComment=1217511120000#c3385843689344701710
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स्टेनली का डब्बा, बच्चा, सहारा...डॉ अमर (साभार रश्मि रवीजा)





बाल श्रम...हमारे देश में इसे रोकने के लिए क़ानून भी है...लेकिन क्या गांव, क्या शहर, क्या मेट्रो...हर जगह बच्चे मज़दूरी करते नज़र आ जाएंगे...आप क़ानून तो बना सकते हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसे रोक नहीं सकते...रश्मि रवीजा ने अपनी पोस्ट स्टेनली का डब्बा पर आई डॉ अमर कुमार की एक टिप्पणी भेजी है...ये अकेली टिप्पणी ही बताने के लिए काफ़ी है कि डॉ अमर कुमार किस माटी के बने थे...वो किरदार जिनके आगे सभी बौने हो जाते हैं...मेरी विनती है कि इस टिप्पणी के साथ रश्मि बहना की पोस्ट और उसी पोस्ट में दिए हुए लिंक के ज़रिए डॉ अमर कुमार की रचना को भी ज़रूर पढ़ें....

डा० अमर कुमार said...
.
तो... मेरी पोस्ट किसी को प्रेरणा भी दे सकती हैं, अहाहा हा... किंम आश्चर्यम !
दरसल मेरा पोस्ट भी स्टेनली को देखने के बाद स्वयँ लिपिबद्ध होने को मचल उठा ।
मुझे स्टेनली का उत्तरार्ध .. उसका मैला-कुचैला टिफ़िन का डिब्बा.. वर्मा सर के सम्मुख एक एक कर व्यँजन परोसना, उनका शर्मिन्दगी से फूट पड़ना फ़िल्म को एक कृत्रिम ऑरा की ओर धकेल देता है... फिर भी बालश्रम का मुद्दा ज़्वलँत तो है ही । 1982 से 1991 तक मैंनें कई किशोरों ( लगभग 14 बच्चों ) को नाई की दुकान, परचून वेंडर शॉप , होटलों से उठाया... उनमें से 10 को ग्रेज़ुऎट स्तर तक ले गया, 2 अध्यापक हैं, 6 सरकारी और गैर-सरकारी सँस्थानों में कार्यरत हैं, शेष अपना स्वतँत्र व्यवसाय कर रहे हैं ।
यह उदाहरण मैंने अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने को नहीं दिया है, बल्कि यह दर्शाता है कि व्यक्तिगत स्तर पर भी इनका उद्धार किया जा सकता है... इनके मध्य स्वतः ही बुक-क्लॅब बन जाता है.. थोड़ी भागदौड़ और प्रयास से अधिकाँश को फ़्रीशिप भी मिल जाती है ।
अब आप इस उदाहरण से प्रेरणा लेकर किसी दो बच्चे को सहारा दे दें, इससे नेक और सँतोष देने वाला कार्य अन्य कोई नहीं ।


June 12, 2011 9:05 AM
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जग हँसा क्यूँ राम मिले न माया है..डॉ अमर( साभार राजीव तनेजा)



आज डॉक्टर अमर कुमार की तेरहवीं है...डॉक्टर साहब को विनम्र श्रद्धांजलि...
टिप्पणियों की कड़ी में आज राजीव तनेजा भाई को मिले डॉक्टर साहब के अनमोल वचन....


डा० अमर कुमार said...
.अँदाज़े बयाँ मस्त है, बकिया कॅन्ट्रोवर्सी पर कुछ न कहूँगा ।
खसम किया - बुरा किया, करके छोड़ दिया - उससे ज़्यादा बुरा किया, छोड़ कर दुबारा पकड़ लिया - हाय रे तूने ये क्या किया ...... ऎसी नौबत ही क्यों आये, ब्लॉगिंग क्यों छोड़े भला !

11:07 PM, May 11, 2011

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डा० अमर कुमार said...
सरफ़रोशी को सलवार पहनी..
फिर पतली गली उन्होंनें पकड़ी
अपनी ही चालों ने यूँ दौड़ाया है
जग हँसा क्यूँ राम मिले न माया है

11:11 AM, June 13, 2011

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डा० अमर कुमार said...
यो कहाणी पढण आले कू टिन्शन देण वास्ते लिख्या के ?
लिखदा रह चल लिखदा रह, आग्यै क्या लिक्खे सै ?

1:15 AM, May 27, 2011
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डा० अमर कुमार said...
आज हँसते रहो पर
राजीव के मन की व्यथा झलक रही है ।
कोई है, यहाँ ब्लागर पर, इस लड़के की मदद करने को ?
2:42 AM, July 21, 2008
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काश मैं अनुराग होता...डॉ अमर (साभार डॉ अनुराग आर्य)

डॉ अनुराग आर्य के लिए डॉ अमर कुमार का ये कहना कि काश मैं अनुराग होता...अपने आप में ही सब कुछ कह देता है, इसके आगे कुछ भी कहने के लिए नहीं बचता...



काश मैं भी अनुराग होता,
और यहाँ दर्ज़ करता... तेज औ’ शातिर निगाहों से इन्फ़ेक्टेड बचपन की यादें... बनते और फूटते यादों के बुलबुले... उन बुलबुलों में उभरते मिटते रँगीन नक्शे...उन फ़ानी बुलबुलों पर उतर आये नक्शों की बदलती रँगीनियों के मायने.. जो अपनी उम्र के अलग अलग मुकाम पर अपना अलग अहसास छोड़ जाते.. इधर मैं अपनी उम्र के मुकाम के हिसाब से हर बार उन्हें चौंक कर देखता.. उनके लिये अल्फ़ाज़ तलाशने को उन पर आँखें गड़ाता मैं... पहचान लिये जाने पर चँद शोख बुलबुले इतराते हुये आसमान को बढ़ लेते.. आवारा यादों के यूँ ढँगर-ढँगर डोलते रहने की यही सज़ा होती हो, शायद... मायूस से कुछ बुलबुले भारी मन से ज़मीन पर लेट जाते.. और कुछ गीली निशानियाँ वहाँ छॊड़ते हुये बेबस दम तोड़ जाते.... पर कुछ तो जैसे चिढ़ कर झुँड बनाते हुये बुज़्ज़ों की शक्ल में मेरे चेहरे पर दस्तक देने की जल्दबाजी में खुद ही फूट जाते... तब मैं एक अज़ीब अहसास से शर्मा जाता..
वैसे शर्माना तो आज भी पड़ रहा है, क्योंकि मैं डॉ. अनुराग नहीं हूँ.... जो इतना अच्छा लिख सके.. जिसमें एक स्केच की लकीरों सी सच्चाई हो.. न रँग न रोग़न.. सिर्फ़ सच्चाई, जिसे आप अपनी तरह से गढ़ सकें !
बहुत अच्छे... आसमाँ से ज़मीन की तरफ़ तकने में तुम कामयाब हो, शाबास अनुराग
(लिखना तो चाहता था, शाबास मेरे बच्चे)
खुले विचारों पर बँद दरवाज़ा..
बस यही एक ख़लिश नहीं जाती
पर अब शिकायत भी न करूँगा

29 जनवरी 2011, 5.15 PM
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भैया मेरे.. लाठी से बन्दर को भगाना...डॉ अमर (साभार रचना)




रचना जी का मैं शुक्रगुज़ार हूं, उन्होंने डॉ अमर कुमार की अमूल्य टिप्पणियां भेजी हैं...




डा० अमर कुमार

बुज़ुर्ग़... मैं ? पँगा हो जायेगा , मिश्रा जी ! मेल-मीनोपाज़ पर लेख लिखने को कह कर,मेरे ज़ोश--निट्ठल्ले को पहले ही ललकार चुके हो,मुझको बुज़ुर्ग कह कर नौज़वानों का अपमान मत करो, भाई ! 4 April 2009 20:26

डा० अमर कुमार

यदि यह अंतिम टिप्पणी नहीं है
jaaaaaaaaaaaaaa
nuuuuuuuuuuuuuuuuuuuu
meri jaan
main tujhpe qurbaan
, तो ...खुश न हों मिश्रा जी,यह आप पर नहीं बल्कि कुश की टिप्पणी पर निकल पड़ी है..ऒऎ कुश, छ्ड्ड यार.. दिल वाले ही दुल्हनिया ले जाँदें हण ! 6 April 2009 18:55

डा० अमर कुमार 
 

सहमत हूँ,अपने को विनम्र दिखलाने के प्रयास में अरविन्द जी ऎसा करते होंगे ।
आपका इस प्रकार का संकेत यहाँ रखना
, मार्गदर्शन की एक अच्छी दिशा है..स्वागत है, ऎसी चर्चा का !पण गुरु.. ?अपुन के साथ यही तो गड़बड़ है, कि .. ससुरे किन्तु-परन्तु खर दूषण-की तरह साथ टँगें घूमते हैं ..
तो गुरु
बेहतर करने का प्रयास किया जाये
, कहीं पर कुछ अच्छा देख कर ईर्ष्याग्रस्त ( जल भुन ) हो जाया करने का क्या मायने समझा जाये ।, या ईर्ष्याग्रस्त होकर
.... ?April 06, 2009 3:59 PM



डा. अमर कुमार

আমি জানতেছিলাম, এঈ বলবে আমার বোন !

मैं जानता था, कि बहन यही बोलेंगी ।

I knew that, it will end like it !डँडे का क्या है, रचना बहन ! डँडा भी तो मज़ाकै मा उठावा रहा !
याद है न, " भैया मेरे.. .. लाठी से बन्दर को भगाना " गाया करती थीं ?14  May 2009 19:28


डा. अमर कुमार
किसका.. टाइम ?अरे, अपने अपने मन की मर्ज़ी के मालिकान का ! वस्तुतः यह टाइमखोटी तब होता
और कीबोर्डधारी अगले को पाठक मनवाने में हलाकान होते रहते हैं
, जब पाठ्क अपने को लेखक साबित करने में !हार कोई न मानता, बेचारे कम्प्यूटर का वक़्त जाया होता वह अलग से !नतीज़ा निकला कुछ नहीं, तो हुआ न टाइम खोटी
? April 26, 2009 3:57 PM  


 
डा० अमर कुमार

आज सुबह ब्लागवाणी ब्लाग पर आपकी टिप्पणी देख कर असहज हो गया, यह ख़्याल मेरे मन में आया था । इसे उछालने से पहले जब विचार किया तो पाया कि यह सँभव नहीं है । मुफ़्त के माल और सुविधा पर इतनी धौंस-पट्टी, तो सशुल्क सेवा लेने पर तो ब्लागवाणी टीम को अपने ताबेदार से अधिक कुछ और न समझेंगे । साबित करें कि मैं गलत सोच रहा हूँ ?
आपका दूसरा तर्क तो एकदम ही भटकाने वाला है, यदि धन खर्च करने से किसी साहित्य या भाषा का प्रसार सँभव होता, तो राजभाषा प्रकोष्ठ और अन्य हिन्दी प्रसार निदेशालय अब तक अपना लक्ष्य क्यों न पा सका ? अकेले ’ हिन्दी अपनाइये ’ के बैनर पर प्रतिवर्ष कितना व्यय किया जाता है, एनी गेस ? कोई अँदाज़ा पेश करिये, बाद में मैं इसका ख़ुलासा भी दूँगा !
सो. रचना मैडम जी, स्टार्ट गेसिंग नाऊ ..
हालाँकि मेरी कोई योग्यता तर्कशास्त्र या हिन्दी में नहीं है, फिर भी टिप्पणी विकल्प खुला देख टिपिया दिया । अनिधिकृत तो नहीं है, न ? September 29, 2009 7:54 PM
  

 
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मेरी यादों में डा.अमर कुमार...(साभार अनूप शुक्ल)



फुरसतिया पर अनूप शुक्ल जी ने अनूठे ढंग से डॉ अमर कुमार को कल याद किया...इस पोस्ट से पता चला कि डॉक्टर साहब की पढ़ाई-लिखाई भी अनूप जी के शहर कानपुर में ही हुई थी...अनूप जी ने डॉक्टर साहब की शख्सीयत से जुड़े कई बेबाक पहलुओं को इस पोस्ट में उकेरा है...इसी पोस्ट पर दिए लिंक से डॉक्टर साहब के एक दुर्लभ इंटरव्यू को भी पढ़ने का सौभाग्य मिला...और भी बहुत कुछ सहेजा है अनूप जी ने डॉक्टर साहब को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए इस संग्रहणीय पोस्ट में...




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डॉ अमर कुमार की याद (साभार बी एस पाबला)

31 अगस्त यानि डॉ अमर कुमार की जयंती...जन्मदिन की जगह जयंती कहना वाकई अजीब लग रहा है...लेकिन एक हफ्ता पहले दुनिया को अलविदा कह कर उन्होंने इसे हक़ीक़त बना दिया...मुझे भी इस बात का ब्लॉगजगत के हरदिलअज़ीज़ बी एस पाबला जी की पोस्ट से पता चला...डॉ अमर कुमार की याद में उनकी कुछ टिप्पणियों को संजोए पाबला जी की ये पोस्ट मर्मस्पर्शी है...कमेंट इस पोस्ट पर न देकर पाबला जी की पोस्ट के इस लिंक पर ही दीजिएगा...



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