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बड़ा कौन-प्रशंसक या आलोचक...डॉ अमर कुमार (साभार ZEAL)

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  • Friday, August 26, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal
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  • गागर में सागर...यही कहा जा सकता है डॉ अमर कुमार की टिप्पणियों के लिए...मैं शुक्रगुज़ार हूं डॉ दिव्या (ZEAL) का...जिन्होंने डॉक्टर साहब के इस अनमोल वचन को भेजा...देखिए चंद पंक्तियों में डॉक्टर साहब ने कितनी खूबसूरती से समझाया है कि प्रशंसा और आलोचना का फर्क...किसी के व्यक्तिगत विकास के लिए कितनी ज़रूरी होती है स्वस्थ आलोचना...नीचे उस पोस्ट का लिंक भी है जिस पर डॉक्टर साहब ने ये टिप्पणी की थी...

    डा०अमर कुमार said...
    मित्रता क्या लाँड्री की रसीद है ?शर्तें लागू करना कतई न्यायसँगत नहीं है
    और...मित्रता में कोई शर्त नहीं होती,ऎसे मित्र अनायास नहीं मिला करते
    मित्रता की ऎसी असीमता अर्जित करने के लिये स्वयँ भी बहुत कुछ त्यागने को तत्पर रहना होता है
    इस पोस्ट के सम्बन्ध में मेरा ऎसा ही मानना है मेरा अपना सच तो यह है कि मुझे मेरे मुँह पर आलोचना करने वालों से बेहतर कोई मित्र ही नहीं लगता इसके मानी यह नहीं कि, मैं लतखोरीलाल हूँ.. मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ कि उनमें सच कहने का साहस रहा और इन्हीं आलोचकों ने मुझे माँज माँज कर आज इस मुकाम पर पहुँचाया है
    यह तो बाद में जाना कि कड़वी नीम और करेले की तासीर रक्तशोधक की होती है, जो आप्के स्व को निखार कर सामने लाती है
    पर मैं यह सब कह-सुन-लिख ही क्यों रहा हूँ, यह तो जबरिया राय देने वाली बात हुई
    जो आपके दुःख में आपसे भी ज्यादा दुखी हो उठे... ( क्यों ? फिर उसमें स्वार्थ की गँध लोग क्यों ढूँढ़ें ? )जो आपको अनावश्यक प्रवचन ना देकर , सिर्फ आपको समझे ( समझा-समझी के इस प्रयास में भले ही उसे चाटुकारिता के स्तर तक गिरना पड़े )जो आपके साथ कटु अथवा व्यंगात्मक अथवा ईर्ष्या से युक्त भाषा में बात करता हो ( मेरा ख़्याल है कि दो टूक बात करने वाला दिल से आपका हितैषी होता है )जो निस्वार्थ प्रेम करता हो ( बिनु स्वारथ होंहि प्रीति... हम नही कहा, तुलसी बाबा कहूँ उचारिन रहा, वहि हमहूँ बोला )

    " A single rose can be your garden "
    Yes, its certainly true.. but a flower without thorn can never be a rose. How can I believe this flower being a rose, if its thorns are picked out ?
     

    December 1, 2010 12:45 AM
    ये रहा डॉ दिव्या की पोस्ट का लिंक-

    1 comments:

    दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

    डाक्टर अमर इन शब्दों के माध्यम से हमारे सामने हैं।

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