.

इरॉम शर्मिला को सामूहिक हिस्टीरिया पैदा करने का गुर नहीं आता...डॉ अमर कुमार (साभार रश्मि रवीजा)


सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून के विरोध में ग्यारह साल से भी ज़्यादा वक्त से अनशन कर रही इरॉम चानु शर्मिला को लेकर डॉ अमर कुमार के क्या विचार थे, ये रश्मि रवीजा की पोस्ट पर की गई उनकी टिप्पणियों से जाना जा सकता है...अन्ना के अनशन की कामयाबी के बाद, आज के संदर्भ में इनका महत्व और बढ़ जाता है...रश्मि बहना का शुक्रिया, उन्होंने ये टिप्पणियां इस ब्लॉग के लिए भेजीं...

डा० अमर कुमार
said...
आज ही मेरे मुँह से निकला... बाबा, बाबा, बाबा.... अब बस भी करो, बाबा !Mass Hysteria, Mass frenzy ) पैदा करने का गुर नहीं आता । मीडिया किसी भी आम आदमी को बाँस की फुनगी पर चढ़ा कर खास आदमी में तब्दील कर देती है... उसकी यह मज़बूरी बाज़ारवाद से जुड़े होने की वज़ह से है । मिट्टी को सोना साबित करके बेचना ही उनका पेशा है.. दूसरे पलड़े पर भारतीय जनमानस आता है, भारत के मुख्य-भूमि के लोग कुछ हद तक कश्मीर और बहुत हद तक पूर्वोत्तर को अब तक अपने को अलग रख कर देखते हैं, यही वज़ह है, उनकी तक़लीफों और सँघर्ष की कहानी हमारे लिये कोई मायने नहीं रखती ।
इन दोनों पलड़ों को सँतुलित करने वाला बँदर भारत सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था है... नवम्बर 2004 के आस पास मैं मिज़ोरम और नागालैंड को देखने समझने गया था.. तो कई जगह पर मुझे इँडियन कह कर सँबोधित किया गया.. क्योंकि मुख्यभूमि ( MainLand ) से वहाँ पहुँचने वाले को परमिट लेना पड़ता है, यह बात हमें उनसे अलग करती है ! सिक्किम तक में छँगपा झील को देखने के लिये मुझे अस्थायी अनुमतिपत्र लेना पड़ा... दो जगह सघन तलाशी हुई ( तलाशी लेने वा्ले जवान झाँसी और आगरा के थे ! )
इन सभी परिप्रेक्ष्य में हिन्दी मीडिया के लिये पूर्वाचँल की खबरों की टी.आर.पी. ( राम जाने यह क्या होता है ) नगण्य है । और मीडिया.... बाज़ारवाद से जुड़े होने की वज़ह से मिट्टी को सोना साबित करके बेचना ही उनका पेशा रह गया है । और जनता... मीडिया के समक्ष वह एक तमाशबीन से अधिक की हैसियत नहीं रखती.. वह जो पढ़ायेंगे हम वही गायेंगे ।
इस माहौल में इरॉम चानु शर्मिला को स्मरण करने के लिये आपका आभार ! 2 नवम्बर 2000 को वह वृहस्पतिवार के अपने नियमित धार्मिक उपवास पर थीं.. उस दिन के घटनाक्रम नें उन्हें उन्हें इस कदर हिला दिया कि उन्होंनें हताशापूर्ण क्षोभ में यह प्रण ले लिया कि इस बर्बर कानून के हटने पर ही उनका व्रत टूटेगा ... आगे की कहानी क्या कहें ?
वैसे तो Comment moderation भी हमारी अभिव्यक्ति स्वतँत्रता पर छायी हुई धुँध है, इसके उस पार आम पाठक देख ही कहाँ पाता है । यहाँ दर्ज़ करा दिया, ताकि सनद रहे और सोचने के काम आवे :(

डा० अमर कुमार
said...
June 19, 2011 4:46 AM
अरे वाह.. यहाँ तो गर्मा-गरम बहस चल रही है...
स्वतः ही पक्ष और प्रतिपक्ष बन गये हैं, लगता है हम शैशवास्था से उबर रहे हैं ।
यह एक सुखद सँकेत है.. एच.आर. शर्मा पर कुछ कहने से बचने के बावज़ूद , खुशदीप सहगल और सतीश सक्सेना की टिप्पणी निराश करती है । उनके द्वारा इस पोस्ट को और इसमें निहित मूल भावना को इतने हल्के में लिया जाना आश्चर्यजनक है ।

खुशदीप सहगल-
वाकई इन अनशनकारियों की अलग दुनिया है... क्यों ?
आपको स्मरण होगा कि देश में पहला आमरण अनशन क्राँतिकारी यतीन्द्रनाथ दास (
शर्मिला चारु भी अपने कारणों को स्पष्ट करते हुये कहती हैं, कि...
भाई खुशदीप जी :The Act is too sketchy, too bald and quite inadequate in several particulars". the Act, for whatever reason, has become a symbol of oppression, an object of hate and an instrument of discrimination and high-handedness." It is highly desirable and advisable to repeal the Act altogether, without, of course, losing sight of the overwhelming desire of an overwhelming majority of the [North-East] region that the Army should remain (though the Act should go) फिर आखिर क्या वज़ह है कि सरकार इस रिपोर्ट को ठँडॆ बस्ते में डाल कर सो गयी ?Acknowledging that the Supreme Court had upheld the constitutional validity of the Act, the Committee said that judgment "is not an endorsement of the desirability or advisability of the Act." The apex court may have endorsed the competence of the legislature to enact the law. But "the Court does not — it is not supposed to — pronounce upon the wisdom or the necessity of such an enactment." ( The Hindu, Repeal Armed Forces Act: official panel 8 ocober 2006 )


भाई सतीश सक्सेना जी-
Jatin Das ) ने लाहौर जेल में किया जिसमें 64 वें दिन वह अपनी जिद ( ? ) के कारण शहीद होगये.. किन्तु बाद में अँग्रेज़ सरकार को कैदियों से समान व्यवहार की उनकी माँग पर झुकना ही पड़ा । My fast is on behalf of the people of Manipur. This is not a personal battle – this is symbolic. It is a symbol of truth, love and peace", ( http://manipurfreedom.org )गाँधी की की सामूहिक अवज्ञा की परिकल्पना क्या थी, Nationwide Disobedience ! किन्तु इसमें अराजकता की सँभावनायें भाँप कर उन्होंने चतुराईपूर्वक इसे सविनय अवज्ञा ( Civil Disobedience ) का नाम दिया... सत्याग्रह की मूल भावना यही है न कि रामदेव का सरकस, जिसे मीडिया ने लाइव कवरेज़ देकर विकृत प्रहसन का रूप दे दिया ।Comment moderation has been... promugulated under BSPA ?
Blogger's special power act ... he he he :)










June 17, 2011 6:46 AM

1 comments:

rashmi ravija said...

इरॉम चानु शर्मिला के अनशन को लेकर डा. अमर के बहुत ही स्पष्ट विचार थे....उनकी टिप्पणियों से शर्मीला इरोम के संघर्ष को और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है.

Post a Comment

 
Copyright (c) 2010. अमर कहानियां All Rights Reserved.