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इंसानी फ़ितरत...डॉ अमर कुमार (साभार- डॉ अनवर जमाल)

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  • Friday, August 26, 2011
  • by
  • Khushdeep Sehgal
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  • डॉ अमर कुमार को समर्पित ब्लॉग पर उनकी पहली टिप्पणी प्रकाशन के लिए भाई डॉ अनवर जमाल ने भेजी है...एक बात और मेरे ब्लॉग पर देवेंद्र भाई पांडेय ने एक तार्किक प्रश्न किया कि बिना संदर्भ टिप्पणी को समझना थोड़ा दुरूह हो सकता है...देवेंद्र भाई वैसे तो डॉक्टर साहब की हर टिप्पणी अपने आप में ही मुकअम्मल होती थी...फिर भी कोशिश की जाएगी कि उस पोस्ट का संदर्भ भी एक दो लाइन में या उस पोस्ट का लिंक भी दिया जाए...उदाहरण के तौर पर डॉ अनवर जमाल को भेजी गई डॉ साहब की इसी टिप्पणी को देखिए...इसमें बिना किसी संदर्भ ही पूरी बात समझ आ जाएगी...डॉ अमर कुमार की ये टिप्पणी भाई अनवर जमाल ने इसी साल एक जनवरी को अपने ब्लॉग कमेंट्स गार्डन में प्रकाशित की थी...

    डा० अमर कुमार said...
    लँगूर = इँसानी फ़ितरत का एक चालाक ज़ानवर
    मस्जिद की मीनारें = एक फ़िरके के तरफ़दार
    मंदिर के कंगूरे = दूसरे तबके की दरोदीवार

    यह मुआ लँगूर सदियों से दोनों बिल्लियों को लड़वा कर अपनी रोटी सेंक रहा है !
    अनवर साहब मुआफ़ी अता की जाये तो एक सीधा सवाल आपसे है, अल्लाह के हुक्म की तामील में कितने मुस्लमीन भाई ज़ेहाद अल अक़बर को अख़्तियार कर पाते हैं और इसके दूसरी ज़ानिब क्यों इन भाईयों को ज़ेहाद अल असग़र का रास्ता आसान लगता है ? वज़ह साफ़ है, अरबी आयतों के रटे रटाये मायनों में दीन की सही शक्लो सूरत का अक्स नहीं उतरता ।
    यही बात शायद हम पर भी लागू होता हो, चँद सतरें सँसकीरत की, जिन्हें हम मँत्र कहते कहते इँसानी के तक़ाज़ों से मुँह फेर लेते हैं, यह क्या है ? यह चँद चालाक हाफ़िज़-मुल्लाओं औए शास्त्री-पँडितों की रोज़ी है, लेकिन बतौर आम शहरी अगर हम इन्हें समझ कर भी नासमझ बने रहने में अपने को महफ़ूज़ पाते हैं , हद है !

    ज़ेहाद का क़ुरान में मतलब है- बुराइयों से दूर रहने के लिए मज़हब को अख़्तियार करना ...और इसके दो तरीके बताए गए हैं। एक तो तस्लीमातों का रास्ता-ज़ेहाद अल अक़बर ....इसका मतलब है आदमी अपनी बुराइयों को दूर करें....दूसरा है ज़ेहाद अल असग़र... अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिए भिड़ना.... अगरचे इस्लाम पर ईमान लाने में कोई अड़चन लाये,...किसी मुस्लिम बिरादरान पर कोई किस्म का हमला हो, मुसलमानों से नाइँसाफ़ी हो रही हो, ऐसी हालत में इस तरह के हथियारबन्द ज़ेहाद छेड़ने की बात है, मगर अब इसका मिज़ाज़ ओ मतलब ही बदल गया है...ज़ेहन में ज़ेहाद का नाम आते ही सियासी मँसूबों की बू आती है, यही वज़ह है कि ज़ेहाद के नाम को दुनिया में बदनामियाँ मिलती आयीं हैं ।

    हम लड़ भिड़ कर एक दूसरे की तादाद भले कम कर लें, एक दूसरे के यक़ीदे को फ़तह नहीं कर सकते.. तो फिर क्या ज़रूरत है.. एक दूसरे की चहारदिवारी में झाँकने की ?

    3 comments:

    सतीश सक्सेना said...

    उनके निशान अमर रहेंगे !
    शुभकामनायें !

    DR. ANWER JAMAL said...

    आपने अमर कुमार जी की यह टिप्पणी यहां लगाकर उनकी याद भी ताज़ा कर दी और उनकी गहरी नज़र का नमूना भी पेश कर दिया। इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद ही मैं समझ सका कि वास्तव में ही उन्हें सही जानकारी है। यह बात उन दिनों की है जबकि वह अस्पताल से अपना इलाज कराके ताज़ा ताज़ा लौटे थे और शायद यह उनकी पहली टिप्पणी थी लौटने के बाद। मैंने उनकी इस टिप्पणी का उत्तर दिया तो मुझे महसूस हुआ कि इतना क़ीमती संवाद टिप्पणियों के ढेर में सदा के लिए खो जाएगा। क्यों न इसे सहेज लिया जाए ?
    तब मेरे मन में ‘कमेंट्स गार्डन‘ ब्लॉग बनाने का विचार आया और यह संवाद उस ब्लॉग की पहली पोस्ट बना और यही बात फिर से यहां दोहराई गई है। इस टिप्पणी का जवाब जो हमने दिया था। वह भी यहां आ जाए तो अच्छा रहेगा कि हमने किन शब्दों में उनकी विद्वत्ता को स्वीकारा था ...
    हमने इस टिप्पणी के जवाब में कहा था कि
    वसुधा एक है और सारी धरती के लोग एक ही परिवार है Holy family

    1. जनाब डा. अमर कुमार साहब ! आप ख़ैरियत के साथ हमारे दरम्यान वापस लौट आएं, इसके लिए मैंने अपने रब से दुआ की थी। अब आप हमारे दरम्यान हैं। मैंने बतौर शुक्रे मौला दो रकअत नमाज़ नफ़्ल अदा की और आपके लिए फिर दुआ की।
    आपकी टिप्पणी से आपके इल्मो-फ़ज़्ल को पहचाना जा सकता है। आपने जिहादे कबीर और जिहादे सग़ीर को उसके सही संदर्भ में समझा। यह एक मुश्किल काम था। नफ़रत की आंधियों में दुश्मनी की धूल लोगों की आंखों में पड़ी है। ऐसे में भी आपने खुद को बचाया, वाक़ई बड़ी बात है। इस्लाम के ख़िलाफ़ दुर्भावना का शिकार हो जाना आज राष्ट्रवाद की पहचान बन चुका है। आपके कलाम को सराहने वाले कुछ टिप्पणीकार भी अपने ब्लाग पर दुर्भावनाग्रस्त देखे जा सकते हैं।
    आपने पूछा है कि ऐसे सच्चे मुजाहिद आज कहां हैं ?
    ऐसे मुजाहिद आज भी हर जगह हैं जिनकी आप तारीफ़ कर रहे हैं। अगर वे न होते तो आज समाज में सही-ग़लत की तमीज़ न होती, नैतिकता न होती, धर्म न होता, समाज न होता, यह आलम ही क़ायम न होता। दो चार नहीं, हज़ार दो हज़ार नहीं बल्कि दस लाख ऐसे सत्यसेवी चरित्रवान आदमी तो मैं दिखा सकता हूं आपको। दिखा तो ज़्यादा सकता हूं लेकिन आपके लिए स्वीकारना सहज हो जाए, इसलिए तादाद कम लिख रहा हूं।
    सत्य को पहचानना इंसान का धर्म है। जिस तथ्य और सिद्धांत को आदमी सत्य के रूप में पहचान ले, उसके अनुसार व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से, व्यवस्थित रूप से सामाजिक,राजनैतिक, आर्थिक व अन्य कर्तव्य पूरा करना धर्म है। न तो ईश्वर सौ-पचास हैं और न ही धर्म। सबका मालिक एक है तो सबका धर्म भी एक ही है। दार्शनिकों की किंतु-परंतु और ईशवाणी में क्षेपक के कारण आज बहुत से मत समाज में मौजूद हो गए हैं। मत कभी धर्म नहीं होता और सारे मत कभी सही नहीं होते। एक दूसरे के मत की समीक्षा-आलोचना सदा से होती आई है। एक इलाक़े के प्रचारक सदा से दूसरे मत वालों के दरम्यान देश में भी गए हैं और विदेश में भी। महात्मा बुद्ध ने भी विदेश में अपने मत के प्रचारक भेजे और खुद दयानंद और विवेकानंद भी विदेश में गए अपने मतों का प्रचार करने के लिए और आज भी असंख्य हिंदू गुरू विश्व भर में सभी मत वालों के दरम्यान प्रचार कार्य कर रहे हैं। परमहंस योगानंद का नाम भी इसी कड़ी में लिया जा सकता है। ‘इस्कॉन‘ अर्थात ‘हरे रामा हरे कृष्णा‘ वाले इस बात की एक ज़िंदा मिसाल हैं। ‘इस्कॉन‘ अर्थात ‘हरे रामा हरे कृष्णा‘ और ऐसे ही दीगर बहुत से हिंदू गुरू सभी मत वालों के सामने अपनी आयडियोलॉजी पेश कर रहे हैं। जब कोई प्रचारक दुनिया जहान के सामने अपनी विचारधारा रखता है तो वह आलोचना-समीक्षा को स्वतः ही आमंत्रित करता है। हरेक नया गुरू एक नए मत की बुनियाद रखकर पहले से ही मतों में विभाजित मानव जाति को और ज़्यादा बांटने का काम कर रहा है। मतों की दीवार इंसान के विचार पर टिकी हैं। इंसान का विचार कोई भी हो, उसे समीक्षा आलोचना से परे नहीं माना जा सकता। ख़ासकर तब जबकि उसके प्रचारक सारी दुनिया में उसका प्रचार कर रहे हों।

    DR. ANWER JAMAL said...

    ...धर्म एक है। वसुधा एक है और सारी धरती के लोग एक ही परिवार है और इस परिवार का अधिपति परमेश्वर है। वही एक उपासनीय है और उसी के द्वारा निर्धारित कर्तव्य करणीय हैं, धारणीय हैं। जो बात सही है वह सबके लिए सही है। हवा , रौशनी और पानी सबके लिए एक ही तासीर रखती हैं। जो चीज़ बुरी है वह सबके लिए बुरी है। नशा, ब्याज, दहेज, व्यभिचार और शोषण के सभी रूप हरेक समाज के लिए घातक हैं। अगर पड़ौस में भी कोई अपने बच्चे की पिटाई कर रहा हो तो आस पास के लोग चीख़ पुकार सुनकर मामले को सुलझाने के लिए पहंुचते हैं। उन्हें सज्जन माना जाता है। उनसे कोई नही कहता कि आप दूसरे की चारदीवारी में आ कैसे गए ?
    और यहां तो घर-परिवार दूसरा भी नहीं है बल्कि एक ही है। चातुर्मास में जब देवता को सोया हुआ मान लिया जाता है और शादियां बंद हो जाती हैं तो विवाह से जुड़े कामों को भारी धक्का लगता है। फ़र्नीचर वाले, बैंड बाजे वाले, फूल-माला वाले और होटल मालिक सभी बेरोज़गार से हो जाते हैं। छोटे कामगारों के घरों में तो भूखे मरने तक की नौबत भी आ जाती है। इन कामगारों में केवल हिंदू ही नहीं बल्कि मुसलमान भी होते हैं। हिंदू धर्म की मान्यताओं का असर मुसलमान व्यापारियों और कामगारों के धंधे पर भी पड़ता है और उनके आर्थिक विकास पर भी। जो चीज़ प्रभावित करती है, वह खुद ब खुद आकर्षित करती है। आज भारत में सती प्रथा आदि बहुत सी रस्में नहीं हैं। जिन्हें शूद्र माना जाता था, अछूत माना जाता था। आज उन्हें बराबर का इंसान माना जाता है।
    भारतीय समाज में इस तब्दीली के पीछे मुस्लिम और ईसाई समाज का प्रभाव और संरक्षण एक ऐतिहासिक तथ्य है, जिसे कोई भी प्रबुद्ध आदमी झुठला नहीं सकता। मुस्लिम और ईसाई समाज पर भी हिंदू दर्शन और संस्कृति का प्रभाव अंकित है। यह लेन-देन, सोच-विचार और सहयोग-संघर्ष हमेशा से होता आया है और आज भी जारी है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसे रोका नहीं जा सकता। ईश्वर नज़र न आने के बावजूद मनुष्य को ऐसे ही पढ़ाता-सिखाता और बढ़ाता आ रहा है, यहां तक कि वह उसे चांद पर ले गया और अभी उसे वह सितारों तक ले जाएगा और कहते हैं कि सितारों से आगे जहां और भी हैं।
    एंटी मैटर भी दरयाफ़्त कर लिया गया है।
    इस प्रक्रिया को रोकना तो मुमकिन नहीं है लेकिन यह मुमकिन है कि हम संघर्ष में किस पक्ष की ओर हैं। सत्य और ज्ञान की ओर या असत्य और अज्ञान की ओर।
    आप मौत की आंखों में आंखें डालकर लौटे हैं। अब आपको मान लेना चाहिए कि आपका और मेरा वास एक ही चारदीवारी के अंदर है और मैं आपके लिए ग़ैर नहीं हूं। आपका वास जन्नत में होगा और वहां भी मैं आपके साथ ही रहूंगा, इंशा अल्लाह !
    आप विद्वान हैं सचमुच में। आपको इशारा ही काफ़ी है। ज़्यादा कहना सूरज को दिया दिखाने के समान है। अगर मेरी बात में आपको कोई ग़लती लगे तो प्लीज़ आप उसे सही कर दीजिएगा। मैं आपकी बात क़ुबूल कर लूंगा क्योंकि जो सही है , धर्म वही है। आपकी बात मानने से मेरा धर्म बदल नहीं जाएगा बल्कि मैं धर्म के कमतर स्तर से उच्चतर स्तर पर आ जाऊंगा।
    आशा है आप मेरे उत्थान में दिलचस्पी लेंगे और यह सोचकर मुझे तज नहीं देंगे कि यह तो दूसरे घर का है। बहुत से घरों की विभाजनकारी और विध्वंसक कल्पना का अब अंत हो ही जाना चाहिए। कम से कम आप जैसे विद्वानों के हाथ से ही यह संभव भी है।
    सादर !
    मालिक से दुआ है कि वह आपका और सतीश जी का साया हम पर देर तक बनाए रखे।
    आमीन !
    तथास्तु !!
    एक लेख पर आप नज़र डाल लेंगे तो मैं आपका आभारी होऊंगा।
    1- Islam is Sanatan . सनातन है इस्लाम , मेरा यही पैग़ामby Anwer Jamal
    2- Father Manu मैं चैलेंज करता हूँ कि पूरी दुनिया में कोई एक ही आदमी यह साबित कर दे कि मनु ने ऊँच नीच और ज़ुल्म की शिक्षा दी है , है कोई एक भी विद्वान ? Anwer Jamal

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