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इरॉम शर्मिला को सामूहिक हिस्टीरिया पैदा करने का गुर नहीं आता...डॉ अमर कुमार (साभार रश्मि रवीजा)


सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून के विरोध में ग्यारह साल से भी ज़्यादा वक्त से अनशन कर रही इरॉम चानु शर्मिला को लेकर डॉ अमर कुमार के क्या विचार थे, ये रश्मि रवीजा की पोस्ट पर की गई उनकी टिप्पणियों से जाना जा सकता है...अन्ना के अनशन की कामयाबी के बाद, आज के संदर्भ में इनका महत्व और बढ़ जाता है...रश्मि बहना का शुक्रिया, उन्होंने ये टिप्पणियां इस ब्लॉग के लिए भेजीं...

डा० अमर कुमार
said...
आज ही मेरे मुँह से निकला... बाबा, बाबा, बाबा.... अब बस भी करो, बाबा !Mass Hysteria, Mass frenzy ) पैदा करने का गुर नहीं आता । मीडिया किसी भी आम आदमी को बाँस की फुनगी पर चढ़ा कर खास आदमी में तब्दील कर देती है... उसकी यह मज़बूरी बाज़ारवाद से जुड़े होने की वज़ह से है । मिट्टी को सोना साबित करके बेचना ही उनका पेशा है.. दूसरे पलड़े पर भारतीय जनमानस आता है, भारत के मुख्य-भूमि के लोग कुछ हद तक कश्मीर और बहुत हद तक पूर्वोत्तर को अब तक अपने को अलग रख कर देखते हैं, यही वज़ह है, उनकी तक़लीफों और सँघर्ष की कहानी हमारे लिये कोई मायने नहीं रखती ।
इन दोनों पलड़ों को सँतुलित करने वाला बँदर भारत सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था है... नवम्बर 2004 के आस पास मैं मिज़ोरम और नागालैंड को देखने समझने गया था.. तो कई जगह पर मुझे इँडियन कह कर सँबोधित किया गया.. क्योंकि मुख्यभूमि ( MainLand ) से वहाँ पहुँचने वाले को परमिट लेना पड़ता है, यह बात हमें उनसे अलग करती है ! सिक्किम तक में छँगपा झील को देखने के लिये मुझे अस्थायी अनुमतिपत्र लेना पड़ा... दो जगह सघन तलाशी हुई ( तलाशी लेने वा्ले जवान झाँसी और आगरा के थे ! )
इन सभी परिप्रेक्ष्य में हिन्दी मीडिया के लिये पूर्वाचँल की खबरों की टी.आर.पी. ( राम जाने यह क्या होता है ) नगण्य है । और मीडिया.... बाज़ारवाद से जुड़े होने की वज़ह से मिट्टी को सोना साबित करके बेचना ही उनका पेशा रह गया है । और जनता... मीडिया के समक्ष वह एक तमाशबीन से अधिक की हैसियत नहीं रखती.. वह जो पढ़ायेंगे हम वही गायेंगे ।
इस माहौल में इरॉम चानु शर्मिला को स्मरण करने के लिये आपका आभार ! 2 नवम्बर 2000 को वह वृहस्पतिवार के अपने नियमित धार्मिक उपवास पर थीं.. उस दिन के घटनाक्रम नें उन्हें उन्हें इस कदर हिला दिया कि उन्होंनें हताशापूर्ण क्षोभ में यह प्रण ले लिया कि इस बर्बर कानून के हटने पर ही उनका व्रत टूटेगा ... आगे की कहानी क्या कहें ?
वैसे तो Comment moderation भी हमारी अभिव्यक्ति स्वतँत्रता पर छायी हुई धुँध है, इसके उस पार आम पाठक देख ही कहाँ पाता है । यहाँ दर्ज़ करा दिया, ताकि सनद रहे और सोचने के काम आवे :(

डा० अमर कुमार
said...
June 19, 2011 4:46 AM
अरे वाह.. यहाँ तो गर्मा-गरम बहस चल रही है...
स्वतः ही पक्ष और प्रतिपक्ष बन गये हैं, लगता है हम शैशवास्था से उबर रहे हैं ।
यह एक सुखद सँकेत है.. एच.आर. शर्मा पर कुछ कहने से बचने के बावज़ूद , खुशदीप सहगल और सतीश सक्सेना की टिप्पणी निराश करती है । उनके द्वारा इस पोस्ट को और इसमें निहित मूल भावना को इतने हल्के में लिया जाना आश्चर्यजनक है ।

खुशदीप सहगल-
वाकई इन अनशनकारियों की अलग दुनिया है... क्यों ?
आपको स्मरण होगा कि देश में पहला आमरण अनशन क्राँतिकारी यतीन्द्रनाथ दास (
शर्मिला चारु भी अपने कारणों को स्पष्ट करते हुये कहती हैं, कि...
भाई खुशदीप जी :The Act is too sketchy, too bald and quite inadequate in several particulars". the Act, for whatever reason, has become a symbol of oppression, an object of hate and an instrument of discrimination and high-handedness." It is highly desirable and advisable to repeal the Act altogether, without, of course, losing sight of the overwhelming desire of an overwhelming majority of the [North-East] region that the Army should remain (though the Act should go) फिर आखिर क्या वज़ह है कि सरकार इस रिपोर्ट को ठँडॆ बस्ते में डाल कर सो गयी ?Acknowledging that the Supreme Court had upheld the constitutional validity of the Act, the Committee said that judgment "is not an endorsement of the desirability or advisability of the Act." The apex court may have endorsed the competence of the legislature to enact the law. But "the Court does not — it is not supposed to — pronounce upon the wisdom or the necessity of such an enactment." ( The Hindu, Repeal Armed Forces Act: official panel 8 ocober 2006 )


भाई सतीश सक्सेना जी-
Jatin Das ) ने लाहौर जेल में किया जिसमें 64 वें दिन वह अपनी जिद ( ? ) के कारण शहीद होगये.. किन्तु बाद में अँग्रेज़ सरकार को कैदियों से समान व्यवहार की उनकी माँग पर झुकना ही पड़ा । My fast is on behalf of the people of Manipur. This is not a personal battle – this is symbolic. It is a symbol of truth, love and peace", ( http://manipurfreedom.org )गाँधी की की सामूहिक अवज्ञा की परिकल्पना क्या थी, Nationwide Disobedience ! किन्तु इसमें अराजकता की सँभावनायें भाँप कर उन्होंने चतुराईपूर्वक इसे सविनय अवज्ञा ( Civil Disobedience ) का नाम दिया... सत्याग्रह की मूल भावना यही है न कि रामदेव का सरकस, जिसे मीडिया ने लाइव कवरेज़ देकर विकृत प्रहसन का रूप दे दिया ।Comment moderation has been... promugulated under BSPA ?
Blogger's special power act ... he he he :)










June 17, 2011 6:46 AM
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ब्लॉगजगत की तहज़ीब...डॉ अमर (साभार रचना)

रचना जी का मैं शुक्रगुज़ार हूं, उन्होंने डॉ अमर कुमार की अमूल्य टिप्पणियां भेजी हैं...कुछ टिप्पणियां इस पोस्ट में, शेष अगली पोस्ट में...

डा. अमर कुमार said...



रचना जी, आपको बधाई हो !
आपको बाद में जाना.. आप खरी खरी कहने से नहीं चूकतीं, यह अच्छा लगा !
आपमें लड़ने और जूझने का माद्दा है, यह भला लगता है !
त्रस्त हो रिरियाते व्यक्तित्व ने नारी का बड़ा नुकसान किया है ! आपके सरोकार ज़ायज़ हैं, अब एकांगी दृष्टिकोण ्न रखेंगी.. यह अपेक्षा है !
आप लम्बे समय तक हम सब का साथ दें, पर सचेतक के साथ सखा भाव भी समानांतर रहना चाहिये, है कि नहीं ?
सच्चे मन से इतनी तारीफ़ कर दी, अब तो मेरा कहा सुना माफ़ करें..
वरना क्या साफ़ करना पड़ता है, नौबत ही न आये !

April 11, 2009 9:08 PM


डा० अमर कुमार said...
आपने यह कैसे तय कर लिया कि, आपका काम पूरा हो गया ?
इन चिंगारियों के धधक बनने का समय तो अब आया है, और आप कहती हैं.. कि आपका काम पूरा हो गया !
आपकी कान उमेठू टिप्पणियों ने बहुतों का मार्गदर्शन किया है... और मेरे साथा दूसरी बड़ी बात यह है कि,
अब मैं लडूँगा किससे ? जाइये थोड़ा विश्राम लेकर तरो-ताज़ा होकर दूसरे राउँड के लिये जल्द आइये ।
June 30, 2011 12:15 AM 



डा० अमर कुमार ने कहा…

हर जगह, हर मुद्दे पर, इर्द गिर्द फैले कचरों पर सहमत होते रहना.. ब्लॉगजगत की तहज़ीब में है ।
ऎसी तहज़ीब विचार प्रदूषण के ख़तरे देती है
आपका विचार शून्य होना ही ठीक है !

५ जून २०११ १०:३० पूर्वाह्न



 डा०अमर कुमार said...
आदरणीय समीर भाई,
जान की अमान पाऊँ, तो मैं मूढ़मति भी कुछ पूछ लूँ ? कुछ बुनियादी सवाल है, मुर्ग़ी, बत्तख या शुतुरमुर्ग़ के अंडे से मेरा कोई बहस नहीं । अंडा तो अंडा, क्या हिंदू ..क्या मुसलमान ?
बस एक लघु सी शंका है, पहले वह निवृत करें !
यह तो बताया नहीं कि अंडे कच्चे रहेंगे या उबाल कर लिये जायें ।यदि उबाल कर प्रयुक्त करें, तो पहले उबाल कर छीलें या छील कर उबालें ?
मैंने पैन वगैरह तैयार कर रखा है,बस आपकी प्रतीक्षा है । क्या करें, बेसिक से शुरु करने की ट्रेनिंग मिली हुई है, सो पूछने का साहस कर रहा हूँ !
July 3, 2008 9:57 PM



डा. अमर कुमार said...

क्या करें बेचारे.. निहारते रहने का अंत होता नहीं दिखता ।
नयन बिनु बानी.. सो शब्दों के अभाव में नयनों को ही तृप्त कर लेने का प्रयास है, यह ।
घुमा कर मारा है.. शैली का जोरदार कटाक्ष !
February 23, 2009 3:55 AM 
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हट हट कर मरना, सट सट कर मरना...डॉ अमर (साभार डॉ अनुराग आर्य)

डॉ अनुराग आर्य पेशे से चिकित्सक है...लेकिन उनके अंदर अद्भुत शब्दशिल्पी भी छुपा है...यही वजह है कि उनका लेखन अलग ही बोलता है...डॉ अनुराग से डॉ अमर कुमार का विशेष स्नेह रहा है...डॉ अनुराग के लिखे को डॉ अमर कितना पसंद करते थे, ये उन्हें मिली टिप्पणियों को ही पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है...अगली पोस्टों में डॉ अनुराग को मिली डॉ अमर की टिप्पणियों को आप पढ़ेंगे तो कोशिश करुंगा कि उस पोस्ट विशेष का लिंक भी दूं...डॉ अमर कुमार की इस टिप्पणी में पढ़िए स्मोकिंग और लविंग के साम्य का अनोखा फ़लसफ़ा...




अनुमोदन हेतु प्रेषित :
अ ब स क का प्रतीकीकरण जँच गया
मैं भी सोचता हूँ तुम्हारे अफ़सानों में सिगरेट क्यों छायी रहती है ।
क्विट स्मोकिंग और क्विट लॅविंग में बड़ा साम्य है,
यह जानते हुये कि दोनों कहीं न कहीं जिस्म को घायल कर रही हैं... कोई छोड़ नहीं पाता ।
चीज ही ऎसी है ज़ालिम कि अगर कुछ हट हट कर मरते हैं, तो कुछ सट सट कर भी मरते हैं ।

अनुमोदित करने के लिये धन्यवाद !

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डॉ अनुराग का मैं विशेष तौर पर आभारी हूं...उन्होंने अपनी पोस्ट पर आए डॉ अमर कुमार की टिप्पणियों के अनमोल खज़ाने को इस ब्लॉग के लिए भेजा है...खुशदीप
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पर तुम उन अच्छाईयों में ज़िन्दा रहोगे...डॉ अमर (साभार सतीश सक्सेना)


सतीश सक्सेना भाई जी से डॉ अमर कुमार का खास लगाव था...ठीक एक दोस्त की तरह...दोस्त की तरह ही कभी कभी टांग खिंचाई भी...लेकिन ये सतीश भाई ही थे जिनसे डॉक्टर साहब ने पहली बार ज़िक्र किया था कि उनके मुंह के कैंसर की सर्जरी सात घंटे तक चली...ऐसी हालत में भी ब्लॉगवुड के लिए उनका प्यार इस टिप्पणी से जाहिर होता है-

" Had jaw cancer, got an 7 hour marathon commando surgery last Monday . Do not worry I am ok and will continue to haunt the blogwud for several years. unable to speak clearly for next 3 months. chalega ....sab chalega bhai !
sab manjoor ! "

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नीचे वाली टिप्पणी को गौर से पढ़िए...इसमें डॉक्टर साहब का यही संदेश है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों से गुज़रते हुए भी जिंदादिली नहीं छोड़नी चाहिए-

Dr Amar Kumar:
8 april 2011 at " mere geet"
मेरे दद्दू, मेरे भ्राता... तुमने मुझे ही लपक लिया । धन्य हो आप... और मेरा धन्यवाद भी आपको । इतनी टिप्पणियाँ तो मूल पोस्ट पर भी नहीं है, यहाँ अब तक उपस्थित सभी शुभाकाँक्षियों को मेरा विनम्र अभिवादन !
सँदेश साफ़ है.. जो अपरिहार्य है, उसे हँस कर स्वीकार करिये । बिसूरने से.. रोने चिल्लाने से आपकी सज़ा की मियाद कम न होगी.. उल्टे दर्द और बढ़ ही जायेगा । जब तक जीवित हो, बुरे से अच्छों के पक्ष में लड़ते रहो.. कल कोई तुम्हें याद भले ही न करे... पर तुम उन अच्छाईयों में ज़िन्दा रहोगे ।
गीतकार के शब्दों में... नाम गुम जायेगा... चेहरा यह बदल जायेगा.. मेरी आवाज़ ही पहचान है.. ग़र याद रहे ।
http://satish-saxena.blogspot.com/2011/04/blog-post_08.html

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एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी के बंद होने का डॉक्टर साहब को भी बड़ा दुख था...इसका उन्होंने सतीश भाई से जब ज़िक्र किया था तो वो कैंसर वार्ड में ही थे....


Wow Satish Bhaiya,
I read your mail today only, after recovering a lot from a crisis.
I was the first man to offer my proposal in the likewise manner to The Gupt Duo, I could understand their grief of parting with their dream project.
I took interest and suggested some modifications in Blogprahari,he kindly honored them too... but He was taken for ride, rather lured for a ride by few stalwarts and he Gone Gudum, the fellow kanishk Kashyap !

I own my personal website AMARHINDI and some technical resources too, So I planned an agregater in detail with Kush... BUT THE IRONY OF THE SCENARIO IS A BITTER TRUTH that we need a segregator not an agregater...
who can categorically sort out the region, topic, and GUTwise ;)Posts.

Sorry for such an inexpressive english.. but chalega, I am already being moderated in this Cancer Ward !
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बड़ा कौन-प्रशंसक या आलोचक...डॉ अमर कुमार (साभार ZEAL)

गागर में सागर...यही कहा जा सकता है डॉ अमर कुमार की टिप्पणियों के लिए...मैं शुक्रगुज़ार हूं डॉ दिव्या (ZEAL) का...जिन्होंने डॉक्टर साहब के इस अनमोल वचन को भेजा...देखिए चंद पंक्तियों में डॉक्टर साहब ने कितनी खूबसूरती से समझाया है कि प्रशंसा और आलोचना का फर्क...किसी के व्यक्तिगत विकास के लिए कितनी ज़रूरी होती है स्वस्थ आलोचना...नीचे उस पोस्ट का लिंक भी है जिस पर डॉक्टर साहब ने ये टिप्पणी की थी...

डा०अमर कुमार said...
मित्रता क्या लाँड्री की रसीद है ?शर्तें लागू करना कतई न्यायसँगत नहीं है
और...मित्रता में कोई शर्त नहीं होती,ऎसे मित्र अनायास नहीं मिला करते
मित्रता की ऎसी असीमता अर्जित करने के लिये स्वयँ भी बहुत कुछ त्यागने को तत्पर रहना होता है
इस पोस्ट के सम्बन्ध में मेरा ऎसा ही मानना है मेरा अपना सच तो यह है कि मुझे मेरे मुँह पर आलोचना करने वालों से बेहतर कोई मित्र ही नहीं लगता इसके मानी यह नहीं कि, मैं लतखोरीलाल हूँ.. मैं उनका शुक्रगुज़ार हूँ कि उनमें सच कहने का साहस रहा और इन्हीं आलोचकों ने मुझे माँज माँज कर आज इस मुकाम पर पहुँचाया है
यह तो बाद में जाना कि कड़वी नीम और करेले की तासीर रक्तशोधक की होती है, जो आप्के स्व को निखार कर सामने लाती है
पर मैं यह सब कह-सुन-लिख ही क्यों रहा हूँ, यह तो जबरिया राय देने वाली बात हुई
जो आपके दुःख में आपसे भी ज्यादा दुखी हो उठे... ( क्यों ? फिर उसमें स्वार्थ की गँध लोग क्यों ढूँढ़ें ? )जो आपको अनावश्यक प्रवचन ना देकर , सिर्फ आपको समझे ( समझा-समझी के इस प्रयास में भले ही उसे चाटुकारिता के स्तर तक गिरना पड़े )जो आपके साथ कटु अथवा व्यंगात्मक अथवा ईर्ष्या से युक्त भाषा में बात करता हो ( मेरा ख़्याल है कि दो टूक बात करने वाला दिल से आपका हितैषी होता है )जो निस्वार्थ प्रेम करता हो ( बिनु स्वारथ होंहि प्रीति... हम नही कहा, तुलसी बाबा कहूँ उचारिन रहा, वहि हमहूँ बोला )

" A single rose can be your garden "
Yes, its certainly true.. but a flower without thorn can never be a rose. How can I believe this flower being a rose, if its thorns are picked out ?
 

December 1, 2010 12:45 AM
ये रहा डॉ दिव्या की पोस्ट का लिंक-

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डॉक्टर अमर कुमार...श्रद्धासुमन



डॉक्टर अमर कुमार जी को पोस्टों के ज़रिए ब्लॉगजगत की ओर से अर्पित किए गए सभी श्रद्धासुमन इस लिंक पर पढ़े जा सकते हैं...मौन अमर...अगर कोई पोस्ट लिंक पर आने से छूट गई है तो तत्काल जानकारी दें, उसे अविलंब जोड़ दिया जाएगा...
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इंसानी फ़ितरत...डॉ अमर कुमार (साभार- डॉ अनवर जमाल)

डॉ अमर कुमार को समर्पित ब्लॉग पर उनकी पहली टिप्पणी प्रकाशन के लिए भाई डॉ अनवर जमाल ने भेजी है...एक बात और मेरे ब्लॉग पर देवेंद्र भाई पांडेय ने एक तार्किक प्रश्न किया कि बिना संदर्भ टिप्पणी को समझना थोड़ा दुरूह हो सकता है...देवेंद्र भाई वैसे तो डॉक्टर साहब की हर टिप्पणी अपने आप में ही मुकअम्मल होती थी...फिर भी कोशिश की जाएगी कि उस पोस्ट का संदर्भ भी एक दो लाइन में या उस पोस्ट का लिंक भी दिया जाए...उदाहरण के तौर पर डॉ अनवर जमाल को भेजी गई डॉ साहब की इसी टिप्पणी को देखिए...इसमें बिना किसी संदर्भ ही पूरी बात समझ आ जाएगी...डॉ अमर कुमार की ये टिप्पणी भाई अनवर जमाल ने इसी साल एक जनवरी को अपने ब्लॉग कमेंट्स गार्डन में प्रकाशित की थी...

डा० अमर कुमार said...
लँगूर = इँसानी फ़ितरत का एक चालाक ज़ानवर
मस्जिद की मीनारें = एक फ़िरके के तरफ़दार
मंदिर के कंगूरे = दूसरे तबके की दरोदीवार

यह मुआ लँगूर सदियों से दोनों बिल्लियों को लड़वा कर अपनी रोटी सेंक रहा है !
अनवर साहब मुआफ़ी अता की जाये तो एक सीधा सवाल आपसे है, अल्लाह के हुक्म की तामील में कितने मुस्लमीन भाई ज़ेहाद अल अक़बर को अख़्तियार कर पाते हैं और इसके दूसरी ज़ानिब क्यों इन भाईयों को ज़ेहाद अल असग़र का रास्ता आसान लगता है ? वज़ह साफ़ है, अरबी आयतों के रटे रटाये मायनों में दीन की सही शक्लो सूरत का अक्स नहीं उतरता ।
यही बात शायद हम पर भी लागू होता हो, चँद सतरें सँसकीरत की, जिन्हें हम मँत्र कहते कहते इँसानी के तक़ाज़ों से मुँह फेर लेते हैं, यह क्या है ? यह चँद चालाक हाफ़िज़-मुल्लाओं औए शास्त्री-पँडितों की रोज़ी है, लेकिन बतौर आम शहरी अगर हम इन्हें समझ कर भी नासमझ बने रहने में अपने को महफ़ूज़ पाते हैं , हद है !

ज़ेहाद का क़ुरान में मतलब है- बुराइयों से दूर रहने के लिए मज़हब को अख़्तियार करना ...और इसके दो तरीके बताए गए हैं। एक तो तस्लीमातों का रास्ता-ज़ेहाद अल अक़बर ....इसका मतलब है आदमी अपनी बुराइयों को दूर करें....दूसरा है ज़ेहाद अल असग़र... अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिए भिड़ना.... अगरचे इस्लाम पर ईमान लाने में कोई अड़चन लाये,...किसी मुस्लिम बिरादरान पर कोई किस्म का हमला हो, मुसलमानों से नाइँसाफ़ी हो रही हो, ऐसी हालत में इस तरह के हथियारबन्द ज़ेहाद छेड़ने की बात है, मगर अब इसका मिज़ाज़ ओ मतलब ही बदल गया है...ज़ेहन में ज़ेहाद का नाम आते ही सियासी मँसूबों की बू आती है, यही वज़ह है कि ज़ेहाद के नाम को दुनिया में बदनामियाँ मिलती आयीं हैं ।

हम लड़ भिड़ कर एक दूसरे की तादाद भले कम कर लें, एक दूसरे के यक़ीदे को फ़तह नहीं कर सकते.. तो फिर क्या ज़रूरत है.. एक दूसरे की चहारदिवारी में झाँकने की ?
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डॉ अमर कुमार को समर्पित एक ब्लॉग...


प्रिय ब्लॉग मित्रों,

डॉ अमर कुमार नहीं रहे...ये हक़ीक़त है...लेकिन दिल इसे मानने को तैयार नहीं...मौत को भी ज़िंदादिली सिखा देने वाले शख्स को आखिर मौत कैसे हरा सकती है...कैसे ले जा सकती है ब्लॉग जगत के सरपरस्त को हम सबसे दूर...दर्द को भी कहकहे लगाना सिखा देने वाले डॉ अमर कुमार का शरीर बेशक दुनिया से विदा हो गया लेकिन जब तक ये ब्लॉगिंग रहेगी उनकी रूह, उनकी खुशबू हमेशा इसमें रची-बसी रहेगी...टिप्पणियों में छोड़ी गई उनकी अमर आशीषों के रूप में...

कहते हैं इंटरनेट पर छोड़ा गया एक एक शब्द अमर हो जाता है...और उनका तो नाम ही अमर था...अमर मरे नहीं, अमर कभी मरते नहीं....डॉक्टर साहब अब ऊपर वाले की दुनिया को ब्लॉगिंग सिखाते हुए हम सबकी पोस्टों को भी देखते रहेंगे...डॉ अमर कुमार को समर्पित ये ब्लॉग शाहनवाज़ के साथ मिलकर मेरी एक छोटी सी कोशिश है, उनके छोड़े गए अनमोल वचनों को एक जगह एकत्र करने की...ये महत्ती कार्य आप सबके सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता...मैं अब जुट गया हूं, अपनी पोस्टों पर आईं उनकी एक एक टिप्पणी को सहेजने में...

आपको जब भी थोड़ा वक्त मिले, डॉ अमर कुमार की याद को अमर करने के लिए अपनी पोस्टों पर आईं उनकी टिप्पणियों को सहेजिए...यकीन मानिए ये सीप के मोती अब भी हमें सीख देते रहने के साथ नए ब्लॉगरों के लिए भी प्रकाश-पुंज का कार्य करेंगी...ये टिप्पणियां आप या पर भेज सकते हैं...बस एक विनती और हर टिप्पणी के साथ और तारीख और उनके पब्लिश होने का टाइम भी होता है...अगर उसे भी भेजेंगे तो ये भी पता चलेगा कि किस वक्त डॉक्टर साहब के ज़ेहन में वो विचार आया था...इस काम को अपनी सुविधा के अनुसार करिए...एक टिप्पणी मिले तो एक टिप्पणी भेज दीजिए...वो सब आपके नाम के साथ पोस्ट के रूप में इस ब्लॉग पर चमक बिखेरेंगी...इसके अलावा डॉक्टर साहब से जुड़े आपके संस्मरण हैं तो वो भी भेजिए...

कोशिश यही है कि जब तक ब्लॉगिंग चले, डॉक्टर साहब हमसे कभी जुदा न हों...कितना भी दर्द, दुख डॉक्टर साहब के शरीर ने झेला, लेकिन दूसरों को हंसाना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा...डॉ साहब के इसी जज़्बे को अपने जीवन में उतारना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी...मैं खुशनसीब हूं कि एसएमएस पर उनसे जोक्स पढ़ने-पढ़ाने का सिलसिला चलता रहता था...लगता है अब भी यही आवाज़ कानों में आएगी...खुशदीपे या खुशदीप पुत्तर....

अंत में इसी प्रार्थना के साथ...डॉ अमर कुमार को परमपिता अपने चरण-कमलों में स्थान दे और श्रद्धेय माताजी, रूबी भाभी जी, बेटे डॉ शांतनु अमर के साथ सभी परिवारजनों को इस असीम दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे...

आपकी भेजी जाने वाली डॉ साहब की टिप्पणियों के इंतज़ार में...

आपके

खुशदीप और शाहनवाज़
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